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Andha kyo hai ensan

आंख होते भी अँधा क्यों है इंसान 

Posted on February 5, 2026

यह विरोधाभास ही मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी है। आँखों का होना केवल ‘देखने’ (Looking) की क्षमता है, लेकिन ‘बोध’ (Perceiving) के बिना इंसान अंधा ही रहता है।

योग और अध्यात्म के नजरिए से इंसान के “आँख होते हुए भी अंधे” होने के 4 मुख्य कारण हैं:

1. पूर्वाग्रहों का चश्मा (Spectacles of Prejudice)

हम दुनिया को वैसी नहीं देखते जैसी वह है, बल्कि वैसी देखते हैं जैसे हम हैं। हमारे मन में पहले से ही धारणाएं, विचार, और पसंद-नापसंद की परतें जमी हुई हैं।

  • जैसे: यदि आप किसी से नफरत करते हैं, तो उसकी अच्छाई भी आपको बुराई ही दिखेगी।
  • जब आँख और वस्तु के बीच ‘विचार’ आ जाता है, तो दर्शन (Vision) धुंधला हो जाता है।

2. ‘बाहर’ की चकाचौंध (Blinded by Materialism)

जैसे तेज रोशनी में आँखें चुंधिया जाती हैं और कुछ दिखाई नहीं देता, वैसे ही संसार के भोग, चकाचौंध और दिखावे ने हमारी सूक्ष्म दृष्टि को अंधा कर दिया है।

  • इंसान ‘कीमत’ (Price) तो देख पा रहा है, पर ‘मूल्य’ (Value) नहीं देख पा रहा।
  • वह शरीर को देख रहा है, पर आत्मा को नहीं। वह मकान देख रहा है, पर घर की शांति को नहीं।

3. मन की अनुपस्थिति (Absence of Mind)

आँखें केवल एक खिड़की हैं, देखने वाला पीछे बैठा ‘मन’ है। यदि आप सड़क पर चल रहे हों और आपका मन गहरी चिंता में हो, तो सामने से आपका मित्र भी गुजर जाए तो आप उसे नहीं देख पाते।

  • आज इंसान का मन या तो अतीत (Past) की यादों में है या भविष्य (Future) की चिंताओं में।
  • ‘वर्तमान’ में मन मौजूद नहीं है, इसलिए आँखें खुली होने के बावजूद वह जीवन के सत्य को नहीं देख पाता।

4. अज्ञान (Avidya)

वेदांत में इसे ‘माया’ या ‘अविद्या’ कहा गया है। इसका अर्थ है— जो नश्वर है उसे शाश्वत मान लेना।

  • हम जानते हैं कि मृत्यु निश्चित है, फिर भी हम ऐसे जीते हैं जैसे कभी मरेंगे ही नहीं।
  • हम जानते हैं कि बाहरी वस्तुओं में स्थायी सुख नहीं है, फिर भी हम उन्हीं के पीछे भागते हैं। इस विरोधाभास को ही “खुली आँखों का अंधापन” कहा जाता है।

इस अंधेपन को कैसे दूर करें?

आँखों का इलाज डॉक्टर करता है, लेकिन इस आंतरिक अंधेपन का इलाज ‘विवेक’ करता है।

  1. सजगता (Awareness): चीज़ों को बिना किसी लेबल के देखना सीखें। जब आप एक फूल को देखें, तो यह न कहें कि “यह सुंदर है”, बस उसे उसकी पूर्णता में देखें।
  2. अंतर्मुखी होना: आँखों को बीच-बीच में बंद करके भीतर के अंधेरे को देखने का साहस करें। जब आप भीतर देख पाएंगे, तभी बाहर का सच स्पष्ट होगा।
  3. प्रज्ञा चक्षु (The Third Eye): योग में ‘तीसरी आँख’ का अर्थ है— बुद्धि और अंतर्ज्ञान का जाग्रत होना। जब ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होता है, तो इंसान को वह दिखने लगता है जो साधारण आँखों से परे है।

एक फकीर ने कहा था: > “अंधा वह नहीं जिसकी आँखें नहीं हैं, अंधा वह है जो अपनी कमियों को नहीं देख पाता और ईश्वर की उपस्थिति को महसूस नहीं कर पाता।”

क्या आपको कभी ऐसा लगा है कि आप किसी सच को जानते तो थे, लेकिन उसे ‘देख’ पाने में आपने बहुत देर कर दी? यही वह क्षण है जब हम अपने अंधेपन को पहचानते हैं।

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