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sukhiya sab sansar

​सुखिया सब संसार है, खाए और सोए – कबीरदास

Posted on February 17, 2026

कबीरदास जी की यह साखी हमारे जीवन के एक बहुत ही कड़वे और गहरे सच की ओर इशारा करती है। यह दोहा कुछ इस प्रकार है:

सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवे। दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवे॥

इसका सरल अर्थ

कबीर जी कहते हैं कि यह सारा संसार (आम लोग) बहुत सुखी है क्योंकि वे सिर्फ खाने और सोने (सांसारिक सुखों) में मगन हैं। उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि जीवन का असली उद्देश्य क्या है।

दूसरी ओर, कबीर स्वयं को ‘दुखिया’ कहते हैं क्योंकि वे जाग रहे हैं (आध्यात्मिक रूप से जागरूक हैं) और रो रहे हैं, क्योंकि उन्हें ईश्वर से विरह का अनुभव हो रहा है और वे दुनिया की इस अज्ञानता को देख रहे हैं।


इस दोहे के पीछे का गहरा संदेश

  • अज्ञानता का सुख: अधिकांश लोग भौतिक सुख-सुविधाओं को ही जीवन का लक्ष्य मान लेते हैं। जब तक पेट भरा है और नींद अच्छी आ रही है, वे खुद को सुखी समझते हैं। कबीर इसे एक तरह की ‘बेहोशी’ मानते हैं।
  • जागरूकता का कष्ट: जो व्यक्ति सत्य की खोज में निकलता है या समाज की बुराइयों को देखता है, वह बेचैन हो जाता है। उसे नींद नहीं आती क्योंकि वह जानता है कि यह सांसारिक सुख क्षणभंगुर (temporary) हैं।
  • आध्यात्मिक तड़प: यहाँ ‘रोने’ का अर्थ दुखी होना नहीं, बल्कि परमात्मा से मिलने की तीव्र इच्छा और संसार की नश्वरता को देखकर करुणा महसूस करना है।

​कबीर जी कहते हैं कि यह सारा संसार भौतिक सुखों में डूबा हुआ है। लोग बस खाने-पीने और सोने (सांसारिक सुखों) को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मान बैठे हैं और इसी में वे खुद को सुखी समझते हैं।

​इसके विपरीत, कबीर स्वयं को दुखी बताते हैं क्योंकि वे जाग चुके हैं। यहाँ ‘जागने’ का अर्थ नींद से जागना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरूकता है। वे संसार की नश्वरता (कि सब कुछ एक दिन खत्म हो जाएगा) को देख पा रहे हैं, इसलिए वे प्रभु की भक्ति और विरह में रोते हैं।

​कबीर की बातें आज के समय में भी उतनी ही सटीक बैठती हैं जितनी सदियों पहले थीं।

अक्सर हम जिसे ‘सुकून’ समझते हैं, वह असल में सिर्फ आलस या अज्ञानता होती है। कबीर हमें उस कंफर्ट ज़ोन से बाहर धकेलने की कोशिश करते हैं। उनका मानना है कि जब तक आपके मन में सवाल नहीं उठेंगे, जब तक आप सत्य की तलाश में बेचैन नहीं होंगे, तब तक आप असल में जी नहीं रहे हैं, बस वक्त काट रहे हैं।

कबीर की एक और मशहूर बात है जो इसी सोच को आगे बढ़ाती है:

“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।”

यहाँ भी वे वही बात कह रहे हैं—किताबी ज्ञान या दुनियादारी की समझ आपको ‘जागृत’ नहीं करती, बल्कि संवेदनशीलता और प्रेम ही असली समझदारी है।

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