एक मोटा-ताजा आदमी चूहे से डर जाता है लेकिन एक ब्रह्मचारी शेर से टक्कर ले लेता है। वीर्य जब शरीर से बाहर जाता है तो सृष्टि का सृजन होता है, लेकिन जब वह शरीर के भीतर सुरक्षित होता है, तो ओज बनता है। वीर्य रक्षा से प्राप्त बल केवल मांसपेशियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह नसों और स्नायु तंत्र (Nervous System) को फौलाद जैसा बना देता है।
वीर्य नाश से नुकशान (Loss Due to Semen)
लोग बादाम, घी और दूध तो खूब खाते हैं, लेकिन जैसे एक बाल्टी में छेद हो तो उसमें कितना भी पानी डालो, वह कभी नहीं भरेगी; वैसे ही वीर्य नाश शरीर की उस बाल्टी का छेद है। आयुर्वेद कहता है कि भोजन से रस बनता है, रस से रक्त, और इसी क्रम में अंत में ‘शुक्र’ (वीर्य) बनता है। जो ऊर्जा शरीर की हड्डियों, मज्जा और बुद्धि को मजबूत करने में लगनी चाहिए थी, उसे लोग क्षणिक सुख के लिए बहा देते हैं। इसीलिए अच्छा खाने के बाद भी चेहरा निस्तेज और शरीर थका हुआ रहता है। आत्मविश्वास (Self-confidence) गिर जाता है। उसे छोटी-छोटी बातों पर घबराहट (Anxiety) होने लगती है। आँखों में आँखें डालकर बात करने की हिम्मत खत्म हो जाती है। जब भीतर ‘ओज’ नहीं होता, तो मन कमजोर हो जाता है। भय वहीं वास करता है जहाँ शक्ति का अभाव हो।
वीर्य रक्षा का प्रभाव (Effect of Semen Protection)
बंगाल में एक बाबा थे। जिनका नाम था टाइगर स्वामी। वह शेरों और चीतों को उठाकर धड़ाम-धड़ाम पटक देते थे। लोग शेर से डरते हैं लेकिन शेर उनसे डरते थे। यह होता का ब्रह्मचर्य का पावर। आपने भारत के ग्रेट खली का नाम तो सुना होगा। खली ने साल 2006 में WWE में कदम रखते ही सीधे अंडरटेकर पर हमला किया था। उन्होंने अंडरटेकर को केवल एक हाथ से उठाकर पटक दिया था और उसके सिर पर अपना विशाल पैर रखकर जीत का जश्न मनाया था। उस समय पूरी दुनिया हैरान थी कि कोई अंडरटेकर को इतनी आसानी से कैसे हरा सकता है। 2007 में एक ‘बैटल रॉयल’ (Battle Royal) मैच के दौरान खली ने एक साथ 20 रेसलर्स को रिंग से बाहर फेंककर वर्ल्ड हैवीवेट चैंपियनशिप जीती थी। उस रात उन्होंने रिंग में मौजूद लगभग हर रेसलर की पिटाई की थी।
एक ब्रह्मचारी शेर से इसलिए नहीं डरता क्योंकि उसने अपनी इंद्रियों पर विजय पा ली होती है। जिसे अपनी मृत्यु का भय नहीं और जिसकी ऊर्जा ऊर्ध्वगामी (ऊपर की ओर बहने वाली) हो गई है, उसे संसार की कोई भी शक्ति डरा नहीं सकती।
आयुर्वेद और ब्रह्मचर्य
वीर्य की कीमत : आयुर्वेद में कहा गया है: “मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्।”
अर्थात, वीर्य का पतन मृत्यु (शक्ति का क्षय) है और उसका संरक्षण ही जीवन है। शरीर की सात धातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा) का अंतिम और सबसे शुद्ध निचोड़ ‘शुक्र’ यानी वीर्य है।
ब्रह्मचर्य केवल शारीरिक वीर्य को रोकने तक सीमित नहीं है। यह मन, वाणी और कर्म की पवित्रता भी है। जब हम अपने विचारों को शुद्ध रखते हैं, तभी वह ऊर्जा वास्तविक “ओज” में परिवर्तित होती है। ब्रह्मचर्य व्यक्तित्व विकास का सर्वोच्च साधन है। यह मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर देवत्व की ओर ले जाता है।
निष्कर्ष: “आज के युग में जहाँ विलासिता के साधन प्रचुर हैं, वहाँ ब्रह्मचर्य का मार्ग ही एक युवा को मानसिक गुलामी और शारीरिक कमजोरी से बाहर निकाल सकता है। असली मर्दानगी भोग में नहीं, बल्कि योग और आत्म-संयम में है।”