परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy) आधुनिक विज्ञान का एक अद्भुत चमत्कार है। यह ऊर्जा का एक बहुत ही शक्तिशाली स्रोत है, जो छोटे से पदार्थ से भी भारी मात्रा में बिजली पैदा कर सकता है। यहाँ इसका आसान भाषा में विवरण दिया गया है:
परमाणु ऊर्जा किस चीज से बनती है?
परमाणु ऊर्जा मुख्य रूप से यूरेनियम (Uranium) नामक तत्व से बनाई जाती है। यूरेनियम एक विशेष प्रकार की धातु है जो खदानों से मिलती है। सबसे अधिक Uranium-235 का उपयोग किया जाता है क्योंकि इसके परमाणु को तोड़ना आसान होता है। कुछ जगहों पर थोरियम (Thorium) और प्लूटोनियम (Plutonium) का भी इस्तेमाल किया जाता है।
परमाणु ऊर्जा बनाने की मुख्य प्रक्रिया को परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) कहा जाता है। जब यूरेनियम के एक परमाणु के नाभिक (Center) पर एक न्यूट्रॉन से हमला किया जाता है, तो वह नाभिक दो हिस्सों में टूट जाता है। परमाणु के टूटने पर बहुत अधिक मात्रा में गर्मी (Heat) और और अधिक न्यूट्रॉन निकलते हैं। निकले हुए न्यूट्रॉन दूसरे यूरेनियम परमाणुओं से टकराते हैं और उन्हें भी तोड़ देते हैं। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है, जिसे ‘चेन रिएक्शन’ कहते हैं।
परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Nuclear Power Plant) बिल्कुल वैसे ही काम करता है जैसे कोयले से चलने वाला प्लांट, बस यहाँ गर्मी पैदा करने का तरीका अलग है। रिएक्टर के अंदर होने वाले परमाणु विखंडन से भीषण गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी का उपयोग पानी को उबालने के लिए किया जाता है, जिससे उच्च दबाव वाली भाप (Steam) बनती है। यह भाप तेजी से एक विशाल टर्बाइन के पंखों से टकराती है और उसे घुमाती है। टर्बाइन एक जनरेटर से जुड़ा होता है। जब टर्बाइन घूमता है, तो जनरेटर बिजली पैदा करता है।
यूरेनियम की खोज किसने की
यूरेनियम की खोज 1789 में जर्मन रसायनशास्त्री मार्टिन हेनरिक क्लैप्रोथ (Martin Heinrich Klaproth) ने की थी। इसकी खोज से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें हैं। क्लैप्रोथ ने ‘पिचब्लेंड’ (Pitchblende) नामक खनिज का विश्लेषण करते समय इसे खोजा था। शुरुआत में उन्होंने जिसे शुद्ध यूरेनियम समझा था, वह वास्तव में यूरेनियम का एक ऑक्साइड था। उन्होंने इसका नाम उस समय के हाल ही में खोजे गए ग्रह ‘यूरनस’ (Uranus) के सम्मान में ‘यूरेनियम’ रखा।
यूरेनियम को उसके शुद्ध धातु रूप में पहली बार 1841 में फ्रांसीसी रसायनशास्त्री यूजीन-मेलचियोर पेलिगोट (Eugène-Melchior Péligot) द्वारा अलग किया गया था। हालांकि इसकी खोज 1789 में हुई थी, लेकिन इसकी रेडियोधर्मी (Radioactive) प्रकृति का पता बहुत बाद में 1896 में हेनरी बेकरेल (Henri Becquerel) ने लगाया था। शुरुआत में यूरेनियम का उपयोग मुख्य रूप से कांच और चीनी मिट्टी के बर्तनों को पीला या हरा रंग देने के लिए किया जाता था। इसकी असली शक्ति (परमाणु ऊर्जा) का पता तो 20वीं सदी में चला।
शुद्ध यूरेनियम कैसे मिला
क्लैप्रोथ जर्मनी के जोआचिमस्टल (Joachimsthal) की खानों से मिले एक काले, भारी खनिज की जांच कर रहे थे, जिसे पिचब्लेंड कहा जाता था। उस समय के वैज्ञानिक समझते थे कि यह लोहा और जस्ते (Zinc) का मिश्रण है। क्लैप्रोथ ने इस खनिज को नाइट्रिट एसिड (Nitric Acid) में घोला और फिर उसे पोटैशियम हाइड्रोक्साइड के साथ उदासीन (Neutralize) किया। इस प्रक्रिया के दौरान उन्होंने देखा कि एक पीला पदार्थ (Yellow Precipitate) नीचे बैठ गया है। जब उन्होंने इस पीले पदार्थ को कोयले के साथ गर्म किया, तो उन्हें एक काला पाउडर मिला। क्लैप्रोथ एक मंझे हुए रसायनशास्त्री थे; उन्होंने देखा कि इस पाउडर के गुण उस समय ज्ञात किसी भी धातु (जैसे लोहा या जस्ता) से मेल नहीं खाते थे। क्लैप्रोथ ने जिसे “शुद्ध धातु” समझा था, वह असल में यूरेनियम ऑक्साइड था। लेकिन उन्होंने यह सही पहचान लिया था कि इसमें एक ऐसा तत्व है जिसे पहले कभी नहीं देखा गया।
यूरेनियम नाम कैसे पड़ा ?
ठीक उसी दौर (1781) में खगोलशास्त्री विलियम हर्षेल ने सौरमंडल के एक नए ग्रह ‘यूरनस’ (Uranus) की खोज की थी। उस समय विज्ञान की दुनिया में इस नए ग्रह की बहुत चर्चा थी। क्लैप्रोथ ने अपनी इस नई खोज को इसी ग्रह के नाम पर “यूरेनियम” नाम दे दिया। क्या आप जानते हैं? लगभग 100 साल बाद तक किसी को नहीं पता था कि यूरेनियम से बिजली बन सकती है। 1896 में हेनरी बेकरेल ने गलती से एक फोटोग्राफिक प्लेट को यूरेनियम के पास छोड़ दिया था, जिससे पता चला कि इसमें से कुछ अदृश्य किरणें (Radiation) निकलती हैं। वहीं से परमाणु युग की असली शुरुआत हुई। हेनरी बेकरेल की उस “गलती” के बाद विज्ञान की दुनिया में एक ऐसी क्रांति आई जिसने पूरी दुनिया को बदल कर रख दिया। यहाँ से कहानी खोज (Discovery) से शक्ति (Power) की ओर बढ़ी।
मैरी क्यूरी और ‘रेडियोधर्मिता’ (1898)
बेकरेल की खोज के बाद मैरी क्यूरी और उनके पति पियरे क्यूरी ने इस पर गहराई से शोध किया। मैरी क्यूरी ने ही सबसे पहले “रेडियोधर्मिता” (Radioactivity) शब्द दिया। उन्होंने पाया कि यूरेनियम से निकलने वाली किरणें परमाणु के भीतर से आ रही हैं। इसी शोध के दौरान उन्होंने पोलोनियम और रेडियम जैसे नए तत्वों की भी खोज की।
आइंस्टीन का जादुई सूत्र (1905)
इसी बीच अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपना प्रसिद्ध समीकरण दिया: E=mc2
इस सूत्र ने दुनिया को बताया कि द्रव्यमान (Mass) को ऊर्जा (Energy) में बदला जा सकता है। इसने यह साबित किया कि यूरेनियम जैसे तत्वों के छोटे से हिस्से में भी विनाशकारी और असीमित ऊर्जा छिपी हुई है।
परमाणु विखंडन की खोज (1938-39)
यह सबसे बड़ा मोड़ था। ओटो हैन (Otto Hahn) और फ्रिट्ज़ स्ट्रैसमैन ने पाया कि जब यूरेनियम के परमाणु पर न्यूट्रॉन की बमबारी की जाती है, तो वह टूट जाता है। लीज़ मेटनर ने इसकी व्याख्या की और इसे ‘फिशन’ (Fission) नाम दिया। वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि इस प्रक्रिया से “चेन रिएक्शन” शुरू किया जा सकता है।
मैनहट्टन प्रोजेक्ट और परमाणु बम (1940 का दशक)
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, अमेरिका ने डर के मारे (कि कहीं जर्मनी पहले न बना ले) ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ शुरू किया। जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने यूरेनियम का इस्तेमाल करके दुनिया का पहला परमाणु बम बनाया, जिसका दुखद उपयोग 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुआ।
यूरेनियम का शांतिपूर्ण उपयोग
बिजली का उत्पादन (1950 के बाद) शुरू हुआ। युद्ध के बाद, वैज्ञानिकों ने इस विनाशकारी शक्ति को मानवता की भलाई के लिए मोड़ने की कोशिश की। 1951 में अमेरिका ने पहली बार परमाणु ऊर्जा से बिजली के बल्ब जलाए गए थे । 1954 में रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) के ओबनिंस्क (Obninsk) में दुनिया का पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र खुला जिसने ग्रिड को बिजली दी। आज दुनिया की लगभग 10% बिजली परमाणु ऊर्जा से आती है। भारत भी इसमें पीछे नहीं है; हमारे पास तारापुर, कुडनकुलम और कैगा जैसे कई परमाणु बिजली घर हैं।
निष्कर्ष: परमाणु ऊर्जा एक “स्वच्छ” ऊर्जा स्रोत है क्योंकि यह हवा में ग्रीनहाउस गैसें नहीं छोड़ती, लेकिन इसके रेडियोधर्मी कचरे का प्रबंधन बहुत सावधानी से करना पड़ता है।