किन्नर समुदाय (हिजड़ा समुदाय) में एक रात की शादी की परंपरा उनके आराध्य देव इरावन (अरावन) से जुड़ी हुई है। यह परंपरा मुख्य रूप से तमिलनाडु के कूवगम (Koovagam) गांव में आयोजित होने वाले वार्षिक उत्सव के दौरान निभाई जाती है।
इसके पीछे की पौराणिक कथा और कारण निम्नलिखित हैं:
महाभारत की पौराणिक कथा (Mahabharata Mythological Story)
महाभारत के युद्ध के दौरान एक समय ऐसा आया जब पांडवों की जीत के लिए एक राजकुमार की बलि दी जानी थी। इसके लिए अर्जुन के पुत्र इरावन तैयार हुए, लेकिन उनकी एक अंतिम इच्छा थी कि वे मरने से पहले विवाह करना चाहते थे।
समस्या यह थी कि कोई भी राजकुमारी ऐसे व्यक्ति से विवाह करने को तैयार नहीं थी जिसकी अगली सुबह मृत्यु निश्चित हो। तब भगवान कृष्ण ने मोहिनी का रूप धारण किया और इरावन से विवाह किया। अगले दिन इरावन की बलि दे दी गई और मोहिनी (कृष्ण) ने एक विधवा की तरह शोक मनाया।
परंपरा का महत्व
किन्नर स्वयं को भगवान कृष्ण का वही ‘मोहिनी’ रूप मानते हैं। इसी मान्यता के कारण वे इस परंपरा को निभाते हैं:
हर साल उत्सव के दौरान किन्नर भगवान इरावन की मूर्ति के साथ विवाह करते हैं। मंदिर के पुजारी उनके गले में 'तली' (मंगलसूत्र) बांधते हैं। इस दिन वे दुल्हन की तरह सजते हैं और खुशियां मनाते हैं। विवाह के अगले दिन, भगवान इरावन की प्रतीकात्मक मृत्यु के बाद, किन्नर अपना श्रृंगार उतार देते हैं, चूड़ियां तोड़ते हैं और सफेद कपड़े पहनकर विधवा के रूप में शोक मनाते हैं।
सामाजिक और आध्यात्मिक पहलू
अरावन उत्सव तमिलनाडु (Aravan Festival Tamil Nadu) : यह परंपरा उनके समुदाय के लिए केवल एक रस्म नहीं, बल्कि अपनी पहचान और आस्था को अभिव्यक्त करने का एक तरीका है। यह उनके आराध्य के प्रति उनके समर्पण और पौराणिक इतिहास से उनके जुड़ाव को दर्शाता है। यह परंपरा वास्तव में आस्था और त्याग का एक अनूठा संगम है। तमिलनाडु के कूवगम (Koovagam) में होने वाला यह उत्सव दुनिया भर के पर्यटकों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करता है।
इस रस्म के बारे में कुछ और दिलचस्प बातें जो इसे खास बनाती हैं:
हर साल हज़ारों की संख्या में किन्नर इस १८-दिवसीय उत्सव में शामिल होने के लिए इकट्ठा होते हैं। यह उनके लिए एक तरह का 'री-यूनियन' भी होता है। उस एक रात के लिए वे सबसे सुंदर साड़ियाँ और आभूषण पहनते हैं। उनके लिए यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को 'मोहिनी' के रूप में जीने का एक मौका होता है। अगले दिन जब वे विधवा का रूप धारण करते हैं, तो वे पूरी तरह से शोक में डूब जाते हैं। यह दिखाता है कि वे अपनी पौराणिक जड़ों से कितनी गहराई से जुड़े हुए हैं।
भारतीय संस्कृति में ऐसी कई अन्य रोचक परंपराएं भी हैं। क्या आप किन्नर समुदाय की अन्य सामाजिक प्रथाओं के बारे में जानना चाहेंगे, या किसी विशेष पौराणिक कथा में आपकी रुचि है?
निष्कर्ष : अंत में यह जरूर लिखें कि यह परंपरा न केवल धार्मिक है, बल्कि किन्नर समुदाय को समाज में एक विशेष सांस्कृतिक पहचान भी देती है।