हमारे पास दो चार बंगले और गाड़ी हो जाता है तो फूल जाते हैं लेकिन संत डायोजनीज के पास संपत्ति के नाम पर सिर्फ एक चोगा (कपड़ा), एक लाठी और भीख मांगने के लिए एक कटोरा था। एक दिन उन्होंने एक बच्चे को अंजलि (हाथों) से पानी पीते देखा। उन्होंने तुरंत अपना कटोरा भी फेंक दिया और कहा, “इस बच्चे ने मुझे सिखाया कि मैं अभी भी अनावश्यक संपत्ति का बोझ उठा रहा था।” ऐसी चेतना के धनी थे संत डायोजनीज। अब बात करते हैं महान सिकंदर की :
संत डायोजनीज और सिकंदर महान की कहानी | जीवन की सच्ची सीख
यह इतिहास का एक बेहद अद्भुत घटना है। जो सिकंदर आधी दुनिया को अपनी तलवार के दम पर झुका चुका था, वो कोरिंथ के एक मैदान में मिट्टी के मटके में रहने वाले एक नग्न फकीर के सामने नतमस्तक हो गया।
सिकंदर को डायोजनीज के सामने किसी डर या मजबूरी में नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक श्रेष्ठता के आगे झुकना पड़ा था। इसके पीछे मुख्य रूप से 4 बड़े कारण थे:
1. जिसके पास खोने को कुछ नहीं, उसे डराया नहीं जा सकता
सिकंदर राजाओं को हराता था क्योंकि राजाओं को अपना राज्य, धन, पत्नियां और जान खोने का डर होता था। लेकिन डायोजनीज के पास खोने के लिए कुछ था ही नहीं। जब सिकंदर अपनी पूरी सेना और लाव-लश्कर के साथ उनके सामने खड़ा हुआ, तब भी डायोजनीज आराम से लेटे रहे और उन्होंने उठकर राजा का अभिवादन तक नहीं किया। सिकंदर ने देखा कि जिस मौत और तबाही के डर से पूरी दुनिया कांपती है, वह डर इस फकीर के सामने बेअसर है।
2. इच्छाओं पर विजय (सच्चा सम्राट कौन?)
सिकंदर पूरी दुनिया को जीतना चाहता था, जिसका मतलब था कि वह अपनी ‘इच्छाओं का गुलाम’ था। वह अंदर से अतृप्त (unsatisfied) था। वहीं दूसरी ओर, डायोजनीज पूरी तरह संतुष्ट थे।
जब सिकंदर ने बड़े घमंड से कहा, “मैं सिकंदर महान हूँ, मांगो तुम्हें क्या चाहिए?” तो डायोजनीज ने ऐसा जवाब दिया जिसने सिकंदर के अहंकार को एक पल में तोड़ दिया। उन्होंने कहा— “बस थोड़ा किनारे हट जाओ, तुम मेरे और सूरज के बीच खड़े होकर मेरी धूप रोक रहे हो।” सिकंदर को समझ आ गया कि जो व्यक्ति मुझसे कुछ मांग ही नहीं रहा, वह मुझसे कहीं ज्यादा अमीर और बड़ा सम्राट है।
3. सिकंदर के गुरु ‘अरस्तू’ का प्रभाव
सिकंदर कोई साधारण क्रूर राजा नहीं था, वह महान दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) का शिष्य था। उसे ज्ञान, दर्शन और बुद्धिमान लोगों की कद्र करना सिखाया गया था। वह एथेंस और ग्रीस के दार्शनिकों के बारे में बहुत कुछ सुन चुका था। जब उसने डायोजनीज की इस बेबाकी और निडरता को साक्षात देखा, तो उसके भीतर का ‘शिष्य और दार्शनिक’ जाग गया। वह समझ गया कि यह कोई पागल भिखारी नहीं, बल्कि ज्ञान की पराकाष्ठा पर पहुंचा हुआ कोई संत है।
4. पाखंड से परे पूर्ण सत्य
सिकंदर के आसपास जितने भी लोग थे—चाहे उसके सेनापति हों, दरबारी हों या पराजित राजा—सब उसकी चापलूसी करते थे, उसकी हां में हां मिलाते थे और अपनी जान बख्शने की भीख मांगते थे। सिकंदर इस चापलूसी से थक चुका था। डायोजनीज के रूप में उसे जीवन में पहली बार एक ऐसा इंसान मिला जिसने बिना किसी मुखौटे के, पूरी तरह नग्न सत्य उसके सामने रख दिया था।
सिकंदर का ऐतिहासिक कथन:
इस मुलाकात के बाद जब सिकंदर के सैनिक और सेनापति डायोजनीज का मजाक उड़ाने लगे कि वह कितना बदतमीज बूढ़ा है, तब सिकंदर ने मुड़कर अपनी सेना से एक ऐतिहासिक बात कही थी:
"अगर मैं सिकंदर न होता, तो मैं डायोजनीज होना पसंद करता।"
यह वाक्य साबित करता है कि भले ही सिकंदर दुनिया का विजेता था, लेकिन उस पल उसके भीतर के इंसान ने स्वीकार किया था कि आंतरिक शांति और स्वतंत्रता के मामले में डायोजनीज ही असली विजेता थे।
कथा कहती है कि सिकंदर के मरने के बाद उसकी माँ शमशान में जाती है और वहां सिकंदर के जनाजे के पास चिल्लाती है कि “बेटा सिकंदर उठ तू नहीं मर सकता। तू विश्व का महान विजेता है। उठ बेटा ! तब शमशान का चौकीदार बोलता है : माँ ! आपकी कौन से सिकंदर की बात कर रही हो। यहाँ जितने भी मुर्दे गड़े हैं वह सब अपने समय के सिकंदर थे।
तो भाईओं समय रहते अगर आदमी सत्पथ को प्राप्त कर लेता है तो जीवन सार्थक हो जाता है, नहीं तो अपने समय के महान सिकंदर तो सब हैं।
निष्कर्ष : अपने समय का हर कोई सिकंदर है। सबकी अपनी-अपनी इच्छा, कामना और वासनाएं हैं। सब उसी को पूरा करने में लगे हैं लेकिन कोई बिरला ही संत डायोजनीज जैसा होता है। जिसके आगे दुनिया को झुकाने वाले भी उनके चरणों में झुक जाते हैं। ऐसी योग्यता सबके पास है।